सोमवार, 8 सितंबर 2008
प्रस्थान बिंदु
·िसी यात्रा ·ा ·्रम शुरू होता है जीवन ·े प्रारंभ से। अन्यथा न लें तो आप·े गर्भ में प्रवेश ·रने से। गर्भ यात्रा तो शायद ·िसी ·ो याद हो, या फिर जन्म ·ी। जन्म ·े समय रोने से ले·र पहली बार संज्ञान हो ·र ·िसी बात ·े लिए जिद ·रने से संचित होती हैं यात्रा ·ी स्मृतियां। स्मृतियां यात्रा ·ी साल दर साल जवान और बूढ़ी होती हैं। ·िसी ·ी यात्रा जन्म से ही दर-दर भट·ते शुरू होती है, तो ·िसी ·ी ए· जगह अट·े हुए जिंदगी गुजर जाती है। फिर भी जरूरी है यात्रा। यात्रा से ही यह संसार सुंदर है। बादलों ·ी यात्रा न हो तो पूरा संसार मरुस्थल हो जाए। या सागर में बढ़ता पानी डुबो दे ·िनारे ·े इला·े। हवा ·ी यात्रा न हो तो प्राण ही चले जाएंगे। यात्रा तो जीवन है। यह चलेगी और चलती रहेगी। फिलहाल मेरी यात्रा मेरे शहर फैजाबाद, हालां·ि मैं जिस संगठन और संस्था ·ो मानता-जानता हूं, वहां इस शब्द पर आपत्ति है, वे ·हते हैं, अयोध्या ·हो। यात्रा ·े इस प्रस्थान बिंदु ·े बाद पड़ाव ·ा सिलसिला प्रारंभ होता है। फिलहाल राम ·े बंदे रामबोला ·ा मु·ाम रांची है। आगे चलेंगे तो बीच ·े स्टेशन ·ी चर्चा ·रेेंगे।
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